देवदार की व्यथा
देवदार की इक शाख पर बैठी
इक नीली चिड़िया बोली
दूर तेरे शहर से इक गांव बसता है
जहां देखे वन कटते, नया रस्ता बनता है।
बोला देवदार,
हां, उस गांव से आई कुछ ठण्डी हवाएं
सुना गईं मुझे बन्धुओं की पीड़ाएं।
भला था मैं पहले ,जब एक बार दशकों मे
कटने के लि ए चुना जाता
और देव रथ मे गढ़कर इतराता
देवो का सिंहासन बन के इठलाता
मानुषों की लय में झूमता, गाता।
इसलिए ही मैं देवदार कहलाता।
चाहूं मैं , मेरे मन की भी कभी बात बने
मुझे भी कभी मेरे देव अपने रथ के लिए चुने।
बंधुओं का दुख क्षणिक,
बिन आंसू मेरा रुदन ,
किन्तु मेरा विषाद कल के लिए।
न जाने मेरे कितने ही अपने बलि
चढ़ ग ए , मानव तेरी अनगिनत
ख्वाहिशों के लि ए,
तुम्हारे नाज़ नखरों के लि ए।
आज कटे हैॅ मेरे बन्धु ,कल शायद आए मेरी बारी।
मानव ह्रदय तृष्णा भरा
क्या जाने पीर हमारी ।
किंतु जाके करना
तुम उन्हे आगाह,
न आंकना मुझे कम,
मुझ में दधीची की अस्थियों जैसा दम।
जब न होंगे हम , प्रलय का मंज़र होगा
मानव ! तुम्हारी सत्ता है हम से
गर न होंगे हम कहां बच पाओगे तुम।
धरे रह जाएंगे सपने सुनहरे
न प्यास बुझती मरिचिका के सहारे।
कहना कि क्या जानो तुम मेरी पीड़ा।
पहले होना होगा तुम्हें देवदार।
अडिग,विशाल और त्याग हेतु तैयार।
-नंदिनी
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