फिर उसी आग में भेज देते हो…
मैं रोती हूँ, सिसकती हूँ,
टूटकर तुम्हारे पास आती हूँ,
अपने दर्द की गठरी खोलकर
तुम्हें हर बात बताती हूँ।
तुम मुझे समझाते हो,
कुछ हौसले बँधाते हो,
मायके आई बेटी की तरह
फिर उसी घर लौटा आते हो।
जहाँ गालियाँ हैं, अपमान है,
कभी मार है, कभी इल्ज़ाम है।
जहाँ मैं तन-मन-धन अर्पण करती हूँ,
उनके घर और बच्चों की देखभाल करती हूँ।
जिन्हें मेरी सेवा तो चाहिए,
मगर मेरी इज़्ज़त नहीं।
मैं हताश हूँ, निराश हूँ,
अब और समझौते नहीं चाहती।
जब तुम्हारे पास आती हूँ,
तो वापसी की सलाह नहीं,
एक सुरक्षित रास्ता चाहती हूँ।
मैं घर बसाना जानती हूँ,
मगर खुद को मिटाकर नहीं।
मैं रिश्ते निभाना जानती हूँ,
मगर अपना सम्मान गँवाकर नहीं।
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