आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

एक सुरक्षित रास्ता चाहती हूँ।

                
                                                         
                            फिर उसी आग में भेज देते हो…
                                                                 
                            

मैं रोती हूँ, सिसकती हूँ,
टूटकर तुम्हारे पास आती हूँ,
अपने दर्द की गठरी खोलकर
तुम्हें हर बात बताती हूँ।

तुम मुझे समझाते हो,
कुछ हौसले बँधाते हो,
मायके आई बेटी की तरह
फिर उसी घर लौटा आते हो।

जहाँ गालियाँ हैं, अपमान है,
कभी मार है, कभी इल्ज़ाम है।
जहाँ मैं तन-मन-धन अर्पण करती हूँ,
उनके घर और बच्चों की देखभाल करती हूँ।

जिन्हें मेरी सेवा तो चाहिए,
मगर मेरी इज़्ज़त नहीं।

मैं हताश हूँ, निराश हूँ,
अब और समझौते नहीं चाहती।
जब तुम्हारे पास आती हूँ,
तो वापसी की सलाह नहीं,
एक सुरक्षित रास्ता चाहती हूँ।

मैं घर बसाना जानती हूँ,
मगर खुद को मिटाकर नहीं।
मैं रिश्ते निभाना जानती हूँ,
मगर अपना सम्मान गँवाकर नहीं।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर