अरे ओ मन से हारने वाले,
क्यों तू है वर्षो से द्वंद्व पाले।
न हो विचलित कभी तू ये मानव,
पड़ जाए चाहे पग में तेरे छाले।।
अब समय है, शीश काटो तुम शत्रु का।
आधीर न हो समर में, प्रश्न है भविष्य का।
मत छोड़ दो तुम जो तुम्हारे मन का दानव,
गरज गरज तुम नाम लो भगवान का।।
चलते रहो बढ़ते रहो , अपनी माँ के लाले।
कहता है प्रिंस बस, विजय मन पर पाले।।
अरे ओ मन को हारने वाले,
क्यों तू है वर्षो से द्वंद्व पाले।।
- शैलेश मिश्रा "प्रिंस"
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