एक संगदिल की चाह में , तुमने काट ली कलाई
मैं अपने प्रेम की राखी , किसे बांधूं बताओ भाई
मेरी अस्मत की हिफाज़त, अब कौन करेगा
मेरा चेहरा न याद आया , जिस पल छुरी चलाई
खून के ये धब्बे , बहुत कुछ बोल रहे थे
दीवारें सुनके थीं मुज़्तर , जब चीख थी आई
ये आंगन लाल आंसू से , तमाम रात भीगा था
के जब गोद में इसके , तुम्हारी लाश थी आई
अक्सर ये घटाएं पहले , कुछ बात करती थीं
तुम्हारे बाद फिर हवा , कोई पैगाम न लाई
तेरी तस्वीर से लिपटकर , मां खूब रोती है
बस अफ़सोस है करती , कुछ बात न बताई
बापू कुछ नहीं कहते , बस खामोश रहते हैं
कांधे पे जबसे अपनी , अर्थी तेरी उठाई ।।
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