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एक दौड़ क्यूँ है जिसमें ज़िंदगी पिछड़ रही है

                
                                                         
                            एक दौड़ क्यूँ है जिसमें ज़िंदगी पिछड़ रही है
                                                                 
                            
कमाई बढ़ रही है लेकिन ख़ुशी सिकुड़ रही है

उफ़नते हुए सपनों का कातिल भी मैं ही हूं
मेरी ही रूह की लाश, दफ़्तर में सड़ रही है

दोस्तों ने क्या छोड़ दी मिलने की कवायदें
लगता है जैसे जिस्म से जवानी बिछड़ रही है

बिगड़े हुए घर को बनाने को करे नौकरी
और बाप को लगता है बेटी बिगड़ रही है

'शैल’अपनी ही ख़ामोशी से पूछता है ये सवाल
किसे ख़बर कि ज़िंदगी किस मोड़ मुड़ रही है
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3 घंटे पहले

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