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लियाकत नहीं पैसे के दम पे कमाता शोहरत

                
                                                         
                            मग़रूर इन्साँ अपने पैसों  पे इतराता रहता है,
                                                                 
                            
ताक़त पैसे की लोगों को  दिखलाता रहता है।

दरवेश फ़क़ीरों पर तो  कोई ज़ोर नहीं चलता,
ग़ुर्बत के सताए बंदों पर रौब जमाता रहता है।

जीवन का ख़ालीपन भरने की चाहत में देखो,
रस-लोभी भंवरे सा पैसे पे मंडलाता रहता है।

दुनियावी मसाइल से रत्ती भर लेना-देना नहीं,
बस हर वक़्त पैसे का राग अलापता रहता है।

लियाकत नहीं पैसे के दम पे कमाता शोहरत,
फिर गली-गली इसका ढोल बजाता रहता है।
--- शैलेन्द्र भटनागर "शील "
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37 minutes ago

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