मोहब्बत का है मौसम समाँ है सुहाना,
बहारों ने छेड़ा है मोहब्बत का तराना।
घिर आई हैं आस्माँ में घटाएं प्यार की,
ऐसे में ऐ दिलबर तू हमें भूल न जाना।
अलसाया सा प्यार लेने लगा अंगड़ाई,
अरमान भरा दिल होने को है दीवाना।
प्यार का है आलम आ जाओ दो घड़ी,
मिल-जुल करें याद वो ज़माना पुराना।
मोहब्बत की शम'आ फिर करो रौशन,
पंख जलाने को बे-ताब है परवाना।
--- शैलेन्द्र भटनागर "शील "
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