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शमा पिघलती है आतिश से

                
                                                         
                            उनकी फुरकत में जलता है दिल
                                                                 
                            
यादों में उनकी मचलता है दिल
शमा पिघलती है आतिश से
कुछ ऐसे अब पिघलता है दिल ।

शब ए जुदाई की सहर होगी कि नहीं
ये सोचकर ही दहलता है दिल
चला हूँ प्यार के सफ़र को अकेला
क्यूं मेरे साथ तू चलता है दिल।

वहाँ प्यार का मुफ़्त होता है सौदा
यहाँ जान की क़ीमत पे मिलता है दिल
सनम से तुझे फिर खाना है धोखा
क्यूँ अभी ज़ख्मो को सिलता है दिल।

हमें देखकर जो तुर्शरु हुए हैं
उन्हें देखके ख़ुशी से क्यूं उछलता है दिल
ज़ख्मों से उम्रभर जिनके तड़पे हैं शाहिद
क्यूँ उन्हीं की यादों से बहलता है दिल।
-अश्क़ फतेहपुरी
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एक घंटा पहले

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