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महल जो शहर में बने हुए हैं

                
                                                         
                            ना जाने किस मिट्टी के बने हुए हैं
                                                                 
                            
ज़ुल्म करके भी तने हुए हैं
मासूमों को सताकर मसरूर होते हैं
जाने इंसान हैं या हैवान के जने हुए हैं

आज की पीढ़ी को देखकर लगता है
बोये थे आम पर चने हुए हैं
गरीबों का ख़ून मजदूरों की आहें दफ़न हैं
महल जो ये शहर में बने हुए हैं

मौलवी के वाज का ना कोई असर है
गुनाह माहे रमज़ान में घने हुए हैं
आज वो तक़रीर करते हैं महफिलों में
हाथ जिनके ख़ून से सने हुए हैं

अमीरी में सब दोस्त ओ अहबाब थे
मुफलिसी में सब सपने हुए हैं
अश्क़ जब बर्बाद हुए हम जहां में
अपने भी फिर कहां अपने हुए हैं
-अश्क़ फतेहपुरी
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एक घंटा पहले

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