आज दोस्ती से भरोसा उठते देखा
इक पुरानी सी इमारत को गिरते देखा
मैं तो कांटा था शायद उसकी नजरों में
उसको बागों से फूल चुनते देखा
मोहब्बत में तो बेवफाई आम है लेकिन
उसको दोस्ती में दगा करते देखा
जाते जाते वो मुझे बहुत बुरा कह गया
क्या कहूं कि इन आंखों से मैंने क्या क्या देखा
था मुझको उसकी दोस्ती पर बहुत गुरूर
उस गुरूर को मैने टूटते देखा
वो वार करता रहा मैं प्यार समझता रहा
मैंने खुद के ही कत्ल का मंज़र देखा
अब भरोसा करें तो किस पर करें
मैंने दोस्त की शक्ल में दुश्मन देखा ।
- शाहबाज गौरी
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