आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मुस्कुराते हुए

                
                                                         
                            देखते जाने जां जां को जाते हुए
                                                                 
                            
आप रोने लगे मुस्कुराते हुए

जा रहे हो सनम ज़िन्दगी से मिरे
पैर क्यों थम गये दूर जाते हुए

चाक दिल तुम करो आईना देख लो
क्यों तड़पने लगे आज़माते हुए

क्यों निगाहें झुकीं और पर्दा है क्यों
शर्म जब आए ना दिल जलाते हुए

तुझ को भी छोड़ दे कोई रोता हुआ
कैसा लगता है ख़ुद को मिटाते हुए

दिल गुरेज़ा कोई बात हो जाए तो
अश़क आ जाएंगे मुस्कुराते हुए

मेरी उम्मीद भी आप से थी ए शाह
आप ख़ामोश थे ज़ुल्म ढाते हुए

शहाब उद्दीन शाह क़न्नौजी

हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
 
 
4 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर