देखते जाने जां जां को जाते हुए
आप रोने लगे मुस्कुराते हुए
जा रहे हो सनम ज़िन्दगी से मिरे
पैर क्यों थम गये दूर जाते हुए
चाक दिल तुम करो आईना देख लो
क्यों तड़पने लगे आज़माते हुए
क्यों निगाहें झुकीं और पर्दा है क्यों
शर्म जब आए ना दिल जलाते हुए
तुझ को भी छोड़ दे कोई रोता हुआ
कैसा लगता है ख़ुद को मिटाते हुए
दिल गुरेज़ा कोई बात हो जाए तो
अश़क आ जाएंगे मुस्कुराते हुए
मेरी उम्मीद भी आप से थी ए शाह
आप ख़ामोश थे ज़ुल्म ढाते हुए
शहाब उद्दीन शाह क़न्नौजी
हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X