आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हुनर में इश्क़ की थोड़ी मिलावट बाकी है।

                
                                                         
                            अभी तो चंद ही किश्तें चुकाई हैं मैंने,
                                                                 
                            
सफ़र में ज़ब्त की कई मोहलत बाकी है।
जहाँ से होड़ की ख़्वाहिश नहीं रही कोई,
अभी तो ख़ुद से ही अपनी रक़ाबत बाकी है।
तराशना है अभी इस ख़ाम-ओ-ख़याल को,
हुनर में इश्क़ की थोड़ी मिलावट बाकी है।
-शफ़क़ रऊफ
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर