उसने ऐसी नज़र से देखा,
कि मैंने खुद की नज़र झुका ली।
हर नज़र को परखती है वो,
दुपट्टा संभालती हुई चलती है वो—
नज़रों की भाषा पहचानती है।
सही और ग़लत में फ़र्क जानती है,
भीड़ में भी खुद को संभालती है,
क्योंकि वो जानती है—
नज़र सिर्फ़ देखती नहीं…
कभी-कभी बहुत कुछ कह भी जाती है। 🤍
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