ख़ामोशी का भी एक मुक़दमा होता है
हर शख़्स के भीतर एक शहर उजड़ा हुआ होता है,
चेहरे पर सुकूँ, मगर दिल कहीं टूटा हुआ होता है।
हम जिनको समझते हैं महज़ ख़ामोश तबीयत,
उनके भी सीने में कोई तूफ़ान पलता हुआ होता है।
अजीब दस्तूर है इस दुनिया की अदालत का,
यहाँ सच को भी अपने सुबूत देने पड़ते हैं।
और झूठ—
वो शाही लिबास पहनकर आए,
तो लोग उसके इस्तक़बाल में खड़े मिलते हैं।
यहाँ किरदार नहीं, किरदारों की शोहरत बिकती है,
सच बोलने वालों की अक्सर इज़्ज़त बिकती है।
जो झुककर सलाम करे, वो तहज़ीबदार कहलाए,
जो रीढ़ सीधी रखे, उसकी ग़ुरूर में गिनती होती है।
मैंने वक़्त की दहलीज़ पर बैठकर एक बात सीखी है—
हर हार, शिकस्त नहीं होती,
हर जीत, फ़तह नहीं होती।
कभी-कभी ख़ुद्दारी बचाने के लिए
इंसान को अपनी ही ख़्वाहिशों की
मय्यत उठानी पड़ती है।
और सुनो...
किसी की ख़ामोशी को उसकी कमज़ोरी मत समझना,
दरिया जब अपना रुख़ बदलता है,
तो किनारों से इजाज़त नहीं लेता।
कुछ लोग अपनी तकलीफ़ का तमाशा नहीं करते,
अपनी रुसवाई का चर्चा सरे-बाज़ार नहीं करते।
वो टूटते भी हैं तो इस सलीक़े से,
कि उनकी आँखों के सिवा
किसी को उनके बिखरने की ख़बर नहीं होती।
मुझे अब किसी से शिकायत नहीं रही,
बस कुछ उसूल हैं, जिनसे रियायत नहीं रही।
जो मेरी ख़ामोशी को मेरी हार समझ बैठे,
उन्हें क्या ख़बर—
मैंने बहस छोड़ी है,
अपनी सच्चाई नहीं।
अब न किसी से फ़रियाद, न किसी से गिला है,
जो मिला, वो तजुर्बा; जो बिछड़ा, वो फ़लसफ़ा है।
मैंने हर ज़ख़्म को तहज़ीब से रखा अपने भीतर,
कि मेरा दर्द भी मेरी शख़्सियत से बड़ा न हो जाए।
आख़िर में बस इतना समझ आया—
इंसान की असल औक़ात
उसकी आवाज़ की बुलंदी से नहीं,
उसके ज़मीर की गहराई से तय होती है।
क्योंकि वक़्त के पास हर चेहरे का हिसाब है,
हर ख़ामोशी का मतलब, हर आँसू की किताब है।
यहाँ फ़ैसले देर से होते हैं, मगर होते ज़रूर हैं—
और क़ुदरत की अदालत में
न कोई रसूख़ चलता है,
न कोई झूठ लाज़वाब है।
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