तेरी राहों से निकलकर, अब जहाँ की तलाश में, चल पड़े हैं हम अकेले, कारवाँ की तलाश में।
छोड़ आए हैं वो गलियाँ, जिनमें ठहरे थे कभी, अब नज़र है आसमाँ पर, नई उड़ाँ की तलाश में।
यादों का सहारा लिए, अब तलक हम चलते रहे
निकल पड़े हैं ख़ुद से मिलने,अपने जहाँ की तलाश में
ना ज़माने से शिकायत, ना कोई ग़म दिल में है,
रूह निकली है सफ़र पर, अब अमाँ की तलाश में।
बहुत बिखरे, पर संवारना हमने अब सीख ही लिया
दर्द भी अब साथ चलता है, दवा की तलाश में।
मंज़िलों की आरज़ू कम, रास्तों से प्यार है,
चल रहे हैं बस मुसलसल, एक मकाँ की तलाश में।
अपने हांथों हम लिखेंगे,कामयाबी की कहानियाँ
चल पड़ी है ये कलम, उस दास्ताँ की तलाश में।
‘फ़रहीन’ किसी वजूद में, ख़ुद को मत तलाश कर
अपने ही अंदर उतर, अपने निशाँ की तलाश में।
-सीमा फ़रहीन*
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