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इन किताबों की गहराइयों ने

                
                                                         
                            उलझा हुआ था मन मेरा,
                                                                 
                            
तड़प में तन्हाइयों में।
सुलझा दिया है मन मेरे को,
इन किताबों की गहराइयों ने।।

जब दुनिया मुझे रुलाती है,
तब किताबें मुझे बुलाती है।
आकर मेरे जीवन में ये,
उलझे धागे सुलझाती है।।
ये दिखाती है मुझे राह नई,
उलझा रखा था भरमाइयों ने।
सुलझा दिया है मन मेरे को,
इन किताबों की गहराइयों ने।।

किताबें हैं जीवन मेरा,
जीना मुझे सिखाती है।
कौन है बुद्धू कौन है बुद्ध,
अंतर मुझे दिखाती है।।
सत्य खड़ा अब मेरे सामने,
उलझा रखा था परछाइयों ने।
सुलझा दिया है मन मेरे को,
इन किताबों की गहराइयों ने।।

पाकर ज्ञान गीता का,
अर्जुन ने युद्ध जीता था।
धर्म की रक्षा करने खातिर,
बन गया कान्हा मीता था।।
आसान न था कुटुंब से लड़ना,
उलझा रखा था हरजाइयों ने।
सुलझा दिया है मन मेरे को,
इन किताबों की गहराइयों ने।।

गीता हो या हो चाहे पुराण,
बाइबल हो या हो चाहे कुरान।।
वेदों का सब सार वेदांत है,
उठा देखो चाहे कोई प्रमाण।।
ये ग्रंथ सिखाते संघर्ष करना,
उलझा रखा था नरमाईयों ने।
सुलझा दिया है मन मेरे को,
इन किताबों की गहराइयों ने
- सावित्री स्वामी 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

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