एक लहर उठती सी नजर आती है,
पर उठने से पहले ही शांत हो जाती है।
एक ज्वाला जलती सी नजर आती है,
पर जलने से पहले ही राख हो जाती है।।
वो लहर सागर की तो नहीं जो,
उठने से पहले ही शांत हो जाए।
वो ज्वाला अग्नि की तो नहीं जो,
जलने से पहले ही राख हो जाए।।
वो लहर है अजनबी मन की जो,
तूफान की तरह आती है और,
आंखों के दरिया से बह जाती है।
वो ज्वाला है बंधन जलाने की जो,
परंपरा की आड़ में राख हो जाती है।।
एक झरना बहता सा नजर आता है,
पर बहने से पहले ही जम जाता है।
एक धनुष उभरता सा नजर आता है,
पर उभरने से पहले ही मिट जाता है।।
वो झरना जल का तो नहीं जो,
बहने से पहले ही जम जाए।
वो धनुष आकाश का तो नहीं जो,
रंग उभरने से पहले ही मिट जाए।।
वो झरना है उन आंसुओं का जो,
भावनाओं के वेग से उठता है और,
मन अशांति में जम जाता है।
वो धनुष है अटूट मेहनत का जो,
रंग लाने की आस में बनता है और,
थकान की आड़ में मिट जाता है।।
एक उड़ान उड़ती सी नजर आती है,
पर उड़ने से पहले ही गिर जाती है।
एक फसल उगती सी नजर आती है,
पर पकने से पहले ही काट दी जाती है।।
वो उड़ान पक्षी की तो नहीं जो,
उड़ने से पहले ही गिर जाए।
वो फसल बीज की तो नहीं जो,
पकने से पहले ही काट दी जाए।।
वो उड़ान है ऊंचे सपनों की जो,
क्रांति की तरह उठती है और,
शिक्षा के अभाव में गिर जाती है।
वो फसल है उन कर्मों की जो,
फल की चाहत में पनपती है और,
बेईमानी की धार से काट दी जाती है।।
- सावित्री स्वामी
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