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इन झूठे रिश्तों से अच्छा ,जीवन अपना एकाकी हो

                
                                                         
                            मै क्यूं अपनी व्यथा सुनाऊं
                                                                 
                            
कौन जुड़ा है 'अन्तर्मन से जिसको अपनी कथा सुनाऊं ।
मै क्यूं ,,,,,
जो रिश्तों मे बंधे हुए हैं दिल से भी क्या सब मेरे हैं
टूट चुकी रिश्तों की माला ,सब मोती बिखरे बिखरे हैं
क्यों मै समेटूं बिखरे मोती क्यो धागे में उन्हे पिरोऊं।
मै क्यू ,,,,,,,
जिनको मेरी हदय -वेदना से कोई सरोकार नही
मजबूरी मे ढोते रिश्ते उनको मुझसे प्यार नही
उनको भी आजाद करूं ,और खुद भी बन्धन मुक्त हो जाऊं ।
मै क्यूं
जुड़े स्वार्थ बस एक दूजे से ,प्रेम नही है किंचित भर
सामने सब अपने पर पीठ पीछे केवल मिथ्या प्रपंच
मेरी आह और पीड़ा पर जो मुस्काते हैं मन्द मन्द
अपनी अन्तर्मन की पीड़ा का क क्यो उनको आभास कराऊं ।
मै क्यूं
इन झूठे रिश्तों से अच्छा ,जीवन अपना एकाकी हो
खुद को बहुत खर्च किया अब कुछ तो मुझमें बाकी हो
इन कुठिंत रिश्तो का बोझ हटाकर जीवन अपना सरल बनाऊं
मै क्यूं अपनी व्यथा सुनाऊं ।।
- सविता शुक्ला 
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6 घंटे पहले

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