गिरिवर की गोद में पलकर,
जीवन का पथ प्रशस्त किया,
कठिन परिश्रम से घाटी में,
हमने जीवन व्यतीत किया।
अमृत की धार बहाकर जिसने,
निस्वार्थ भाव से सेवा की,
वसुधा की प्यास बुझाने को,
गंगा की निर्मल धारा दी।
अनेक औषधियाँ उपजाकर,
जन-जन का जीवन स्वस्थ किया,
नवल आभा बिखेरकर इसने,
प्रकृति का अद्भुत श्रृंगार किया।
इन पहाड़ों की सुंदरता ने,
देवभूमि को समृद्ध किया,
हर दुःख को सहकर भी इन्होंने,
ममता का आँचल पसार दिया।
देश-विदेशों के लोगों का,
मन इन पहाड़ों ने मोह लिया,
जिसने एक बार इन्हें निहारा,
उसने अपना दिल यहीं दिया।
जो इसी धरातल पर जन्मे थे,
न जाने क्यों इससे ऊब गए,
घर, जमीन और परिवार छोड़,
अज्ञात लोक के पथिक हुए।
अब समय के थपेड़ों से,
इन पहाड़ों का दुःख बढ़ गया,
विकास की व्याकुल आँधी ने,
इनका पावन सीना चीर दिया।
दुःख इनको भी होता है,
मन इनका भी रोता है,
फिर भी स्वार्थ से रहित होकर,
हर जन के मन को सुख देते हैं।
माँ-बाप को भी छोड़ चले,
माटी का घर भी तोड़ चले,
क्या सुंदर दिन हुआ करते थे,
जब सब एक साथ रहा करते थे।
मिट्टी से लीपे हुए घरों में,
ममता की सुगंध हुआ करती थी,
ईंट-सीमेंट के इन भवनों में,
न जाने वह कहाँ खो गई।
देवदार की शीतल छाया,
काफल का रस भूल गए,
धारों के जल की मिठास और
चिड़ियों की कलकल भूल गए।
पहाड़ों पर चढ़-चढ़कर,
विद्यालय जाया करते थे,
कठिन परिश्रम की भट्टी में,
शिक्षा पूरी करते थे।
न जाने वे दिन कहाँ गए,
गाँवों के मीत कहाँ गए,
देवभूमि की दशा देखकर,
मेरी रूह काँप गई।
विकास की राह बनाने को,
इनके पावन तन को कष्ट दिया,
और इसी की छाती पर हमने,
भारी भवनों का भार दिया।
गाँव-गलियारों को सूना कर,
न जाने सब कहाँ चले गए,
स्वर्ग-सी इस माटी को छोड़,
नर्क की राह की ओर बढ़े।
जिस पहाड़ ने सुख-साज़ दिए,
उन्हीं को हमने त्याग दिया,
जिस माटी ने सम्मान दिया,
उसी से नाता तोड़ दिया।
अब भी पहाड़ पुकार रहा,
ममता का आँचल पसार रहा,
जिस मिट्टी ने तुम्हें जन्म दिया,
उससे मत होना दूर कभी।
शहरों की चकाचौंध में,
अपना अस्तित्व बचाए रखना,
भूल न जाना अपनी जड़ों को,
इस माटी का मान बढ़ाना।
राह निहारती बूढ़ी आँखें,
कब से राहें तकती हैं,
भाग-दौड़ में थक जाओ तो,
लौट यहीं फिर आ जाना।
- सौरभ जोशी
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