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खिड़की : जीवन का सफ़र

                
                                                         
                            पहाड़ों की सुंदरता में बसा
                                                                 
                            
मेरा एक छोटा-सा घर है,
उस घर की दीवारों के बीच
एक खिड़की का भी अपना सफ़र है।

वही खिड़की,
जिससे मैंने कोसी नदी का सुंदर दृश्य देखा,
सीढ़ीनुमा खेतों को देखा,
ऊँची पहाड़ियों पर बसे
पत्थरों की छत वाले घर देखे,
जिनकी दीवारों पर मिट्टी के लेप की
पुरानी सोंधी महक बसती थी।

सुनहरे चीड़ के वृक्षों का दृश्य,
बुराँस के लाल फूलों की छटा,
चैत-बैसाख में काफल के पेड़ों की
रसीली लालिमा,
बरसात में पहाड़ियों से निकलते
सुंदर झरने—
न जाने कितने रूपों में
प्रकृति को देखा है मैंने
उसी खिड़की से।

कई बार उसी खिड़की से
दादी को गोबर से आँगन लीपते देखा,
कोहरे से ढके हुए पहाड़ों की
आभा को और निखरते देखा,
गोधूलि बेला में
गायों को वन से घर लौटते देखा।

न जाने क्या-क्या नहीं देखा
उस खिड़की से मैंने,
वह तो सब कुछ दिखला गई।

और वह खिड़की भी तो
अपने आप में बड़ी मनमोहक थी,
तुनी की लकड़ी से बनी हुई,
मेरे उस दो सौ वर्ष पुराने घर की
एक अनमोल पहचान थी।

उसकी लकड़ी पर बनी
न जाने कितनी आकृतियाँ,
कारीगरों ने छेनी और हथौड़े से
अपने हुनर से उकेरी थीं,
मानो उस खिड़की में
किसी पुराने समय की साँसें बसती थीं।

जब सुबह होती थी,
मैं उसी खिड़की से
सूरज की लालिमा देखता था,
दूर बर्फीले पहाड़ों पर पड़ती
सुनहरी किरणों को देखता था।

सुबह पंछियों का वह कलरव,
आसमान का वह नीलापन,
पहाड़ों की वह अनुपम सुंदरता—
सब कुछ तो देखता था
उसी खिड़की के पीछे बैठकर।

माघ-पूस के उन महीनों में
उसी खिड़की से मैंने देखा है,
बर्फीले फूलों को पहाड़ों की सुंदरता में
अपनी सफ़ेद आभा बिखेरते देखा है।

ऐसा लगता था मानो ये बर्फीले फूल भी
उसी खिड़की का स्वागत करने आए हों,
जिस खिड़की से बैठकर मैं
लौकिक से अलौकिक दृश्यों का
दर्शन करता आया हूँ।

बचपन में जब छोटा था,
माँ घास काटने और पिता जी काम पर होते थे,
संध्या ढल जाती थी
और मैं अकेला घर में रह जाता था।

छोटी-सी उस उम्र में
अकेलेपन का डर भीतर समा जाता था,
तब वही खिड़की मेरे लिए
एक सहारा बन जाती थी।

उसी खिड़की के पास बैठकर
मैं उनकी राह निहारा करता था,
हर आहट पर चौंककर
उनके लौट आने का इंतज़ार करता था।

डर से जब मन घबराता,
तो खिड़की के पास बैठ जाता था,
बाहर के बदलते दृश्यों को देखकर
अपने मन को थोड़ा स्थिर करता था।

फिर थोड़ा बड़ा हुआ,
विद्यालय जाने लगा,
अवकाश से पहले हर दिन
उसी खिड़की की ओर नज़र घुमाकर
छुट्टी होने का इंतज़ार करता था।

रात होती तो उसी खिड़की से
पहाड़ों पर चमचमाती रोशनियाँ देखता,
अल्मोड़ा बाज़ार का वह सुंदर दृश्य
मेरे मन को मोह लेता था।

आज उसी खिड़की के पास बैठकर,
रात के अँधेरे में बाहर
लाइटों की चमचमाहट देख रहा हूँ,
और उन रोशनियों के बीच
अपने मन के विचारों को
उजागर कर रहा हूँ।

उन रोशनियों को देखकर
कभी सोचा भी नहीं था
कि एक दिन इन्हीं दृश्यों को छोड़कर,
पेट की आग बुझाने के लिए
शहरों की भागदौड़ में
मुझे भी शामिल होना पड़ेगा।

समय बीता, उम्र बढ़ी,
कंधों पर ज़िम्मेदारियाँ आईं,
अपने गाँव, अपने कस्बे को छोड़कर
दूर प्रदेश की राहें अपनाईं।

दिनभर की भागदौड़ में जब
मन और शरीर थक जाता है,
तब किसी अनजाने शहर में भी
एक खिड़की का सहारा मिल जाता है।

उसी खिड़की से बाहर झाँककर
दुनिया का सौंदर्य देखता हूँ,
कुछ देर के लिए ही सही,
अपने थके मन को सुकून देता हूँ।

वही खिड़की थी
जिसने मुझे सपने दिखाए थे,
बड़ा बनने की राह दिखाई थी,
और उन्हीं सपनों की चाह में
मैं न जाने कितनी खिड़कियाँ छोड़ आया।

लेकिन उसी घर में कहीं
कुछ बूढ़ी आँखें भी हैं,
जो उसी खिड़की पर बैठकर
मेरे लौट आने की राह तकती हैं।

सुबह हो या शाम,
उनकी निगाहें उसी राह पर रहती हैं,
जिस राह से निकलकर मैं आया था,
उसी राह को निहारती रहती हैं।

उसी खिड़की को देखते-देखते
न जाने कब हम इतने बड़े हो गए,
माँ-बाप बूढ़े होते गए
और हम अपने जीवन में व्यस्त होते गए।

पर उनकी आँखों में आज भी
हमारे लौटने की आस रहती है,
वही खिड़की उनकी आँखों के लिए
हम तक पहुँचने की राह रहती है।

और हम—
अपने कार्यक्षेत्र की खिड़की से
कुछ देर बाहर का संसार देखते हैं,
आँखों को तो सुकून देते हैं,
पर भीतर की उथल-पुथल से
कहाँ पूरी तरह मुक्त हो पाते हैं?

बाहर का तो सब देख लिया,
प्रकृति के हर रंग को देख लिया,
लेकिन इसी सबको देखते-देखते
कुछ भीतर से छूट गया।

बाहरी खिड़की खोलकर तो
हम दुनिया का दृश्य देख लेते हैं,
लेकिन भीतर की खिड़की खोलकर
अपने मन का दृश्य देखने से बचते हैं।

बाहर की खिड़की तो नहीं भूले,
पर भीतर की खिड़की को भूल गए।
दुनिया को पाने की चाह में
कहीं अपने ही मन की दुनिया
पीछे छोड़ आए।

आँखों को सुंदर दृश्य दिखाकर
मन को कुछ पल शांत कर लेते हैं,
पर भीतर जो जलता रहता है,
उस पीड़ा को कहाँ देख पाते हैं?

क्योंकि वह खिड़की,
जो आँखों को दृश्य दिखाती है,
अगर भीतर भी खुल जाए,
तो शायद मन को उसका सत्य दिखाती है।

बाहर की दुनिया से सुकून पाकर
भीतर की जलती पीड़ा भी शांत कर पाए,
मन के अँधेरों में उतरकर
अपने ही अंतर्मन का सत्य दिखाए।

इसीलिए मुझे ऐसा एहसास होता है—
शायद खिड़की केवल दीवार में
खुला हुआ एक रास्ता नहीं है,
यह तो जीवन भर का सहारा है।

जो बाहर के दृश्य दिखाते-दिखाते
कभी-कभी हमें भीतर का दृश्य भी दिखाती है,
और चुपचाप यह समझाती है—
जिस संसार को आँखों से देख रहे हो,
कभी अपने भीतर भी झाँककर देखो।

बाहर की खिड़की से दुनिया तो देख ली,
अब कभी भीतर की खिड़की भी खोलकर देखो।
- सौरभ जोशी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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