सुनसान गलियों से चला अकेला मन
जैसे भटक गई राहें भटक गया है तन
उम्मीदें न अब किसी से,बेपरवाह है मन
दर्द से कराहती है हृदय,क्या यही है जीवन
है बुरी साया जगत में, फ़ैली है चारों ओर
फसकर कई बेचारे,छोड़ते हैं अपनों की डोर
धूमिल है प्रकाश,अंधेरो से पटी है जहाँ
मन के बैरी मन से उम्मीदें अब है कहा
-सौरभ दीक्षित
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