भटकी भावों से भटका मन
न ठहरी राहें न ठहरा तन
खोई है साँसे खोया है मन
धीमी प्रकाश छाया है अंधेरा
स्वार्थ ईर्ष्या से पीड़ित जन मन
वक्त के साथ बदलता है चेहरा
-सौरभ दीक्षित
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