हूं मैं गायत्री छंद
हूं मैं कविता के बंद
मैं मार्गशीर्ष, मैं बसंत
मैं ही कीर्ति
मैं ही अपकीर्ति
मैं ही वाणी,मैं ही स्मृति
मैं मेधा, मैं धृति
मैं क्षमा,मेरी क्षमा की प्रवृत्ति
समासों में मैं द्वंद्व,अक्षरों में अकार
है मुझसे सारा संसार
मैं काल का महाकाल
मैं अक्षय काल
मैं धाता
मैं विधाता
मैं ही आदि और अंत
मैं ब्रह्म, मैं वाद
मैं संवाद
मैं राम
मैं श्याम
मैं गंगा,मैं सिंह,मैं गरुड़
मैं तरूण, मैं अरूण
मैं वरूण
मैं यम राज
मैं कामधेनु
मैं साम वेद
मैं मन, मैं चेतना
मैं अवचेतना
मैं शंकर, मैं कुबेर
मैं सुमेरू
मैं वृहस्पति
मैं कार्तिकेय
मैं समंदर
मैं जप
मैं तप
मैं हिमालय
मैं पीपल, मैं नारद
मैं कपिल, मैं चित्ररथ
मैं ऐरावत, मैं राजा
मैं वामन, मैं भास्कर
मैं चांद, मैं इंद्र, मैं मन
मैं पवन
मैं आत्मा
मैं परमात्मा
मैं मगर, मैं तेज,
मैं विजय
मैं निश्चय
मैं वेदव्यास
मैं शुक्राचार्य
मैं आचार्य
मैं नीति
मैं राजनीति
मैं ज्ञान, मैं मौन
मैं बीज, मेरा नहीं अंत
हूं मैं अनंत
सबमें मेरा तेज है
मेरे बिना सब निस्तेज है।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
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