बात चाहे हो कैसी भी
हामी न भरने की कसम
जुबां ले कर बैठी है
और तुमने इजहार
मुहब्बत का कर दिया
क्या कह दूँ अब
कि खुद में उलझा हूंँ
तुममें उलझूं कैसे
खुद को समझ न पाया अब तलक
तुमको समझूं कैसे
मौलिक रचना
-सत्यनिधि द्विवेदी अंशिल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X