मेरा किरदार उसके किरदार में कुछ यूँ ढला कि जैसे कुछ किस्सों के वजूद मिलने पर एक किताब
लिखी जाती हैं
वो पगली बेपरवाही में मशगूल
खुद में न जाने कितने सवाल समेटे जाती हैं
मैं जो कभी एक खामोश समंदर सा
ही रहा
आज जज्बातों की इक हल्की सी तहरीर भी अल्फाज बन जाती है
वो मेरी हैं शिद्दत से कहता हूँ मै यह जानती हैं फिर भी न जाने क्यों इनकार देती है
-सत्यनिधि द्विवेदी अंशिल
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