नौ दिन फिर माँ दुर्गा का पावन त्योहार आएगा,
हर घर में माँ का दीप जलेगा, हर आँगन सज जाएगा। कहीं मूर्ति विराजेगी, कहीं भजन गाए जाएँगे,
माँ के चरणों में श्रद्धा से शीश झुकाए जाएँगे।
पर एक सवाल है… अगर माँ की पूजा करते हो,
तो माँ के रूप को पहचानते क्यों नहीं?
जिस बेटी में माँ की ममता है, जिस बहन में माँ का स्नेह है, जिस बच्ची की मुस्कान में माँ की मासूमियत है—
उसकी इज़्ज़त करना सीखते क्यों नहीं?
माँ दुर्गा की मूर्ति के आगे सिर झुकाना आसान है,
लेकिन किसी बेटी की राह में सम्मान बनकर खड़ा होना महान है।
माँ के नाम पर व्रत रखना अच्छी बात है, लेकिन किसी लड़की को बुरी नजर से न देखना उससे भी बड़ी बात है।
जिस समाज में बेटियाँ सुरक्षित होकर मुस्कुराती हैं,
वहीं माँ दुर्गा सच में प्रसन्न होकर आती हैं।
किसी स्त्री का सम्मान करोगे,
तो समझो माँ के चरणों में फूल चढ़ाओगे।
किसी बेटी की रक्षा करोगे, तो समझो माँ का आशीर्वाद पाओगे।
याद रखना— बेटी केवल बेटी नहीं, माँ दुर्गा का स्वरूप है,
बहन केवल बहन नहीं, सम्मान का स्वरूप है।
हर बच्ची में शक्ति है, हर नारी में सम्मान है,
इनके सम्मान में ही माँ दुर्गा का सच्चा स्थान है।
इस नवरात्रि बस इतना संकल्प लेना, मंदिर में माँ की पूजा के साथ अपने व्यवहार में भी माँ को सम्मान देना।
क्योंकि माँ को खुश करने के लिए सिर्फ दीपक जलाना जरूरी नहीं…
किसी बेटी के चेहरे पर मुस्कान लाना भी जरूरी है।
जिस दिन हर बेटी निडर होकर चलेगी, जिस दिन हर बहन सम्मान से पलेगी, जिस दिन हर नारी सुरक्षित होकर मुस्कुराएगी— उस दिन समझना… माँ दुर्गा स्वयं हमारे बीच आई हैं, और पूरे समाज पर अपनी कृपा बरसाई हैं।
जय माता दी।
-सत्यम चौरसिया
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