यादों में देख लेता हूँ, सौंदर्य शिखा हे बाले!
तनहा बेल-वल्ली-सी तेजस्विनी मधुशाले
भव का दुख दाह जलन संघर्षण सब लुप्त हो जाता
अपार अनंत विश्व में कोई शत्रु न दिख पाता
संतोष आनंद हर्ष नीरवता की मातृत्व साध्य रानी!
मौन तपसी की एकाकी अनुभव असीम कहानी
इक तुम पर ही निछावर किया भ्रमित उर तूफानी
तुम पर ही मुग्ध सदा प्रमत्त पड़ा था मानी।
हाय! इक पल के सुख पर भस्मित हुआ यह जीवन
अँधेरा छटा तब जब पड़ा स्वर्णिम पद पावन
किरणों का चुंबन माधवी-सी हर्षित प्रीति शर्माती-सी
निद्रित सिधुगंधी वनरानी अरुणा-रोली रंगरस भाती-सी
झूम-झूम झनक डोलती जब तब आती सुध मतवाली
वर्तिका सा जल-जल उठता मैं भूतल-तमिस्र-सिंधु आली।
अँखियों में धुँध पलकों में ले अर्क-सार की चंड आगी
इक-इक तेवर में बलिहारी चिन्हित करता पथ अनुरागी
सकुच सलज कुछ तो बोलो खोलो दु:ख की ज्वाला
कब से खोज रहा मैं यह कुमुद रूप-पतंगा मतवाला
डोलो! अब तो कुछ बोलो खनकवती तुम पाषाणी
क्या तुमको द्रवित न करती इस चातक की दु:ख-वाणी।
----सतीश शेखर श्रीवास्तव “परिमल”
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