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घनवाह

                
                                                         
                            मानव विपिन में बनके मलय
                                                                 
                            
श्वांसों के संग घुल आऊँ
निर्मोक शल्ल परस कर घुलमिल आयें
भूल-भूलकर उनकी गलियों
फिर – फिर आऊँ मैं
बावला मन मेरा डगर भूलकर छा जाता हूँ
अहसास होते ही मुझको छूने
छवने लल्ले सब आ जाते
अखिलेश्वर आदिपुरुष ही मुझे जान रहे
अस्मरण का मेरा वृहद अभ्यास
हूँ शून्य मगर अहिदल का प्राण
थम जाने रुक जाने से सब व्याकुल
विकल वृन्द पुष्प विटप हैरान
मैं घुमंतू डग-डग घूमूँ
देखूँ कितने नगर विटोही और ग्राम
सूबा बाट कुटुम्ब और पुरजन
आनन कानन अतल वितल सब
सबको भाता मन लगाता
अपरचित-अपरचित से मेरे नाम
कहीं बोले वीरवा आँधी
कहीं हवा झंझा मेरा नाम
मरुत् पवन समीरण भी कहते मुझको
मैं बावला पिपासित दे दूँ सबको
अपने मंद मधुर धनवाह।

सतीश शेखर श्रीवास्तव “परिमल”
सिंगरौली (मध्यप्रदेश)
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3 वर्ष पहले

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