देखो रे! बहारों के दिन आ गये
कलिका बालाओं के रदों पर मधुकर गीत छाये
अबोध वल्लरियों सार पनघट पर
ले तरुणाई अंतर्घट हर्षित अंतर
हँस रही अँखियों में अलसाई मधुल अनुराग भाये
विपिन अमरी की रोमलताओं सी
आनंदित हो उठी पर्ववल्ली दल इंदिरा श्री
मीहिका कनों के धंधला कितने श्रम धूलिका लहराये
कोरक कुंतल ने विभु लालसा से
‘परिमल' प्रसिद्ध प्रीति लज्जा से
सौंदर्यांचल में मनोहर धुलि से मुक्तामणि बिखराये
देखो रे! बहारों के दिन आ गये।
सतीश शेखर श्रीवास्तव “परिमल”
सिंगरौली (मध्यप्रदेश)
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