चटकती है दिवा की अनमिख रैन-किरणें
नेत्र खोले चंद्रमुख प्रीत से भीगी
हर्षित चंद्रिका-सी कोमल विजनी रसवंत
धवल सौंदर्यांचल में फैला हुआ
सारंगों के वंशो का सधर्म अंबार
यह अकेली – सी शान्त खड़ी
गगन हृदय झरोखे खोल अनुराग
अचिंत पवन-सा हिय कंपन
साध – सा उत्कंठित माने अजय
भुवन की आभार-नत पल पर
क्यों हिल रहा है दर – दर
मद की उफनती धरुण शुभ्रा में
ये नूतन विहंगों से सुंदर – रद
किस ज्योतित कल्पना से विकल
उन्मत्त से उठते थर – थर
किसको देखती है टुकुर – टुकुर
सुंदर-सुध-सी कर नूतन सुख – विस्तार
जिसके परिरंभ में पुलकित
हो जाये स्थिर – सी अनाकार।
- सतीश शेखर श्रीवास्तव “परिमल”
सिंगरौली (मध्यप्रदेश)
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