काश वक़्त ज़रा ठहरता,
ज़रा अनमना-सा चलता,
पलकों के साए में छुपकर,
अश्क़ों से कुछ कहता, कुछ सुनता।
हम, हम न रहते,
मैं, मैं न रहता,
तुम, तुम न रहतीं।
ख़ामोशियों की ज़ुबाँ होती,
धड़कन का फ़साना होता।
फिर ये शाम भी न ढलती,
ये आलम भी न गुज़रता।
एक चाँद आसमाँ में उगता,
एक चाँद दिल में उतरता।
काश वक़्त ज़रा ठहरता...
ज़रा अनमना-सा चलता।
- सतीश कुमार 'रूहदार'
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