कालचक्र की अनवरत गति में
मनुष्य अपने अश्रुओं का नहीं,
अपितु अपने धैर्य का इतिहास रचता है।
विपत्तियों के वज्राघात,
विरह की अग्नि,
अपमान की ज्वालाएँ
और नियति के निर्मम प्रहार,
सब उसके अंतःकरण को विदीर्ण अवश्य करते हैं,
परंतु उसे पराजित नहीं कर पाते।
जो वेदनाएँ
कभी प्राणों के प्रत्येक स्पंदन पर
अधिकार-सा रखती थीं,
काल के महातप में तपकर
वही उसकी आत्मशक्ति का तेज बन जाती हैं।
मनुष्य
दुःख का परित्याग नहीं करता;
वह उसे अपने साहस का अलंकार बना लेता है।
घाव मिटते नहीं,
वे अनुभव के दिव्य चिह्न बनकर
जीवन-गाथा के स्वर्णिम अध्यायों में अंकित हो जाते हैं।
अंततः विजय
दुःख पर नहीं,
स्वयं पर प्राप्त होती है।
यही मानव की अमर गाथा है,
कि वह टूटकर भी बिखरता नहीं,
जलकर भी राख नहीं होता,
अपितु फीनिक्स के समान
अपने ही धधकते अवशेषों से
नवतेज, नवसंकल्प और नवजीवन का
सृजन करता है।
और तब;
वेदना उसकी दुर्बलता नहीं रहती,
वह उसके व्यक्तित्व का दिव्य अभिषेक बन जाती है।
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