सफर ही सफर की कहानी रही है,
सफर में ज़िन्दगी जवानी रही है।
सफर में की सफर से गुफ्तगू
सफर की मुलाकातें रूहानी रही है।
सफर की धूप में जलते रहे हम,
मगर छांव सी इक रवानी रही है।
हर एक कदम पर मिले अजनबी,
हर एक मोड़ पे मेहरबानी रही है।
ज़माने की भीड़ में तन्हा भी थे हम,
ख़यालों की दुनिया सुहानी रही है।
न मंजिल की चाह, न घर का मोह,
राहें ही जीवन की निशानी रही है।
-संतराम शर्मा 'हिन्दी'
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