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मैं एक राही

                
                                                         
                            राही हूं,बस रास्तों से
                                                                 
                            
प्यार करता हूं।
क़दमों की आहट से,
पथ का श्रंगार करता हूं।

मंजिलों की चाह में,
रुकना नहीं आता,
हर अनजाने मोड़ पर,
सफर का इजहार करता हूं।

कभी धूप की तपिश,
कभी छांव का आंचल।
हर मौसम से चुपचाप,
इकरार करता हूं।

ना कोई ठिकाना,
ना कोई मुकाम है मेरा,
बस इन उड़ते बादलों
के संग विहार करता हूं।

थक जाए जो कारवां तो
ग़म क्या है,
मैं खुद अपने पैरों का
यार बनता हूं।
- संतराम शर्मा'हिन्दी'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 घंटे पहले

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