आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

उठ, बाँध ले सिर पर साफा अब

                
                                                         
                            झांक झांक तूं खुद के अन्दर,
                                                                 
                            
सूख रहे खेती के समन्दर।
रे कृषक क्यों मूक भया है
बाहर ला वो पीङा की ज्वाला,
जो धधक रही है मन के अन्दर।

सूख रही है,जल बिन खेती
क्यूं दर्द छुपाता है छाती में।
क्यों सहता चुपचाप जुल्म तू,
अन्याय भरी इस पाँती में?

अन्न दाता जो दुनिया का,
पानी के लिए मोहताज हुआ।
सूख रहे हैं चंचल चमन ,
समझ कहां से आगाज़ हुआ है!

उठ, बाँध ले सिर पर साफा अब,
तू फौलादी चट्टान बना ले।
मत रो इन सूखे खेतों पर,
तू खुद अपनी पहचान बना ले।

जब गरजेगा तेरा यह तेवर,
राज भी अपना काज बदलेगी।
तेरे भीतर की यह ज्वाला ही,
शोषण का रिवाज बदलेगी।
- संतराम शर्मा'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
6 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर