झांक झांक तूं खुद के अन्दर,
सूख रहे खेती के समन्दर।
रे कृषक क्यों मूक भया है
बाहर ला वो पीङा की ज्वाला,
जो धधक रही है मन के अन्दर।
सूख रही है,जल बिन खेती
क्यूं दर्द छुपाता है छाती में।
क्यों सहता चुपचाप जुल्म तू,
अन्याय भरी इस पाँती में?
अन्न दाता जो दुनिया का,
पानी के लिए मोहताज हुआ।
सूख रहे हैं चंचल चमन ,
समझ कहां से आगाज़ हुआ है!
उठ, बाँध ले सिर पर साफा अब,
तू फौलादी चट्टान बना ले।
मत रो इन सूखे खेतों पर,
तू खुद अपनी पहचान बना ले।
जब गरजेगा तेरा यह तेवर,
राज भी अपना काज बदलेगी।
तेरे भीतर की यह ज्वाला ही,
शोषण का रिवाज बदलेगी।
- संतराम शर्मा'
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