और दिन गुज़र रहे उसके इस कदर
कभी गैलरी को टैप करता
कभी उसकी आँखों के
तो कभी माथे पर लगी बिन्दी के सहारे
रात के चार से
दिन के बारह बज जाते
कभी लगा लेता सीने से
उस आधी टूटी स्क्रीन को
और खुद से खुद को रुबरु कराता
कि किसी का पाना तब मालूम पड़ता है
जब उसके खोने का एहसास हो गया हो।
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