बेजुबान की आँखों में,
एक निश्छल प्यार है,
वो निभाता है वफादारी,
उस पर ही संसार है।
बिना कहे वो समझ लेता,
हर सुख और हर गम को,
देकर अपनी सच्ची चाहत,
महका देता हर पल को।
पर सोच रहा हूँ आज बैठकर,
इस दुनिया का ये मंजर,
क्यों इंसान के दिल में जागा,
नफरत का ये खंजर?
जिसको दी थी रब ने अक्ल,
और दी थी ऊँची शान,
हैवानियत की राह पे चलकर,
क्यों भूल गया इंसान?
एक तरफ वो जीव है,
जो जान भी अपनी वार दे,
एक तरफ है मानव जो,
अपनों को ही मार दे।
तन से सुंदर दिखने वाला,
मन से मैला होता है,
पर वो मूक जीव तो देखो,
सुख-दुख में संग रोता है।
अच्छा कौन, बुरा है कौन-
ये तो मन का दर्पण है,
जहाँ मिले निस्वार्थ प्रेम,
वहीं सच्चा जीवन है।
सीखें हम उन जीवों से भी,
प्रेम और वफा का नाता,
तभी धरा पर हर मानव,
सच्चा इंसान कहलाता।
-: सार्थक पियुष सिंह
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