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मन की सुंदरता और कर्मों की चमक

                
                                                         
                            चंदा में हैं दाग बहुत, पर रात को वो चमकाता है,
                                                                 
                            
काली रात के अंधेरे में, शीतल रोशनी फैलाता है।
रूप-रंग से क्या होता है, बाहरी सुंदरता तो ढलती है,
सच्ची आभा तो दुनिया में, नेक कर्म से ही चलती है।

हर इंसान नहीं होता है, दिखने में सुंदर और हसीं,
पर अच्छे कर्मी से बनती, उसकी पहचान यहाँ बेहतरीन।
चेहरे की रंगत खो जाती, पर व्यवहार सदा रह जाता है,
जो करता है परोपकार यहाँ, वो जग में आदर पाता है।

कोई महलों में रहकर भी, मन से कंगाल ही रहता है,
कोई कुटिया का बासी होकर, दर्द पराया सहता है।
सूरत तो बस कुछ बरसों की, सीरत सदियों तक जीती है,
नेकी की खुशबू ही जग में, यादों के अमृत पीती है।

दुआएँ जो कमाता है, वो सबसे अमीर बन जाता है,
बिना पंखों के भी वो तो, आसमान छू आता है।
मशहूर नहीं जो चेहरों से, वो दिलों पर राज करते हैं,
जो देते हैं सहारा सबको, वो खुदा का काम करते हैं।

मत कर मलाल तू रूप का, मन को अपने साफ़ बना,
कर्मी की स्याही से अपनी, तू एक नया इतिहास बना।
जैसे दागों के बाद भी चंदा, सबको ही प्यारा लगता है,
वैसे ही अच्छे कर्मी से, इंसान यहाँ पर चमकता हैं।

-: सार्थक पियुष सिंह
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 दिन पहले

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