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विषैले साँप और विषैले लोग

                
                                                         
                            साँप का विष तो केवल तन को डसता है,
                                                                 
                            
पर इंसान का जहर सीधे मन में बसता है।
एक तरसाता है बस एक ही पल के लिए,
दूसरा खोखला करता है उम्र भर के लिए।

दिखते हैं जो अपने, पीछे छुरी चलाते हैं,
मीठी बातें कर के गहरे जख्म लगाते हैं।
दूर रहो ऐसे चेहरों और उनकी परछाई से,
जो नफरत बुनते हैं रिश्तों की गहराई से।

चमकते हुए चेहरों के पीछे काले साये हैं,
मतलबी रिश्तों के यहाँ गहरे ताने-बाने हैं।
जो सामने हँसते हैं, पीठ पीछे वार करते हैं,
वही लोग वफा के नाम पर व्यापार करते हैं।

काँच के इस शहर में अब पत्थर के दिल धड़कते हैं,
दिखावे की दुनिया में सच्चे जज्बात सिसकते हैं।

पर तुम मत डगमगाना, अपनी हिम्मत को जगाए रखना,
इन विषैले तूफानों में भी अपनी नेकी का दीया जलाए रखना।

पहचानो छिपे हुए इन आस्तीन के साँपों को,
बचा कर रखो खुद को और अपने जज्बातों को।

चुप रहकर अपनी राह पर आगे बढ़ते जाना है,
सच्चाई और अच्छाई से ही नया कल बनाना है।

-: सार्थक पियुष सिंह
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक दिन पहले

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