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मन का सागर

                
                                                         
                            मन को अपने सागर कर लो,
                                                                 
                            
गहरी सोच से इसको भर लो।

नदियाँ, झरने, या हों तालाब,
सबको अपनाता बिना हिसाब।

वह नहीं पूछता किसकी जात,
नहीं रोकता किसी का हाथ।

यह नहीं कहता कि तुम मत आओ,
मेरे भीतर मत समाओ।

गंदा पानी हो या कचरा,
सबको देता एक सा आसरा।

मैले को भी गले लगाता,
खुद में मिलाकर साफ बनाता।

विशाल हृदय का ऐसा रूप,
जैसे अंधियारे में खिली हो धूप।

तुम भी जग में ऐसे बनो,
भेदभाव की राह न चुनो।

-: सार्थक पियुष सिंह
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 घंटे पहले

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