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सूखते पेड़, सूखती संवेदनाएँ

                
                                                         
                            कुछ पेड़ जीवन में खुशियों लाते हैं,
                                                                 
                            
अपनी शीतल छाँव से सबका सहारा बन जाते हैं। धूप कितनी भी तेज हो, खुद तपते रहते हैं,
पर राहगीरों को सुकून देते रहते हैं।

पर कुछ पेड़ ऐसे भी होते हैं,
जो समय के साथ सूख जाते हैं,
ठीक वैसे ही जैसे कुछ इंसान,
दूसरों की खुशियाँ छीनकर खुद उजड़ जाते हैं।

पेड़ हमें फल देते हैं,
पर बदले में कुछ नहीं माँगते,
निःस्वार्थ भाव से हर मौसम सहते हैं,
फिर भी किसी से कोई शिकायत नहीं करते।

मगर आज का इंसान अगर कुछ देता है, तो बदले में अपना स्वार्थ ढूँढता है,
हर रिश्ते में अपना फायदा देखता है,
हर कदम पर अपने मतलब की राह चुनता है।

कुछ पेड़ बड़े लचीले होते हैं,
हबाओं के साथ झुक जाते हैं, पर टूटते नहीं,
आँधियों चाहे जितनी भी आएँ,
वे अपनी जड़ों से कभी रूठते नहीं।

इंसान को भी उनसे सीखना होगा,
वक्त के आगे थोड़ा झुकना होगा,
अहंकार छोड़कर रिश्तों को बचाना होगा,
टूटते संबंधों को प्रेम से संभालना होगा।

कुछ पेड़ न फल देते हैं, न छाया,
बस खड़े रहते हैं चुपचाप और मौन,
आज समाज में ऐसे स्वार्थी लोगों को पहचानेगा आखिर कौन?

पेड़ तो फिर भी अपना धर्म निभाते हैं,
बिना कहे सबको बहुत कुछ सिखाते हैं।

काश इंसान भी पेड़ों से सीख पाता,
बिना स्वार्थ के किसी के काम आ पाता।

क्योंकि जिस दिन इंसान के भीतर
संवेदनाओं का जंगल सूख जाएगा,
उस दिन यह सुंदर संसार भी
धीरे-धीरे एक सूखे जंगल में बदल जाएगा।

 
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11 घंटे पहले

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