खिड़की पर बैठी वो चिड़िया, मन ही मन मुस्काती है,
सोच मनुष्य की देख देख कर, वो हैरान हो जाती है।
मानव कहता "कितना मुश्किल, जीवन इस बेचारी का",
तपते सूरज, कड़कड़ाती ठंड में, घर है आसमान सारा।"
ढूंढना पड़ता दाना-पानी, तिनका-तिनका जोड़ना,
बिना छत के हर आंधी में, अपना हौसला ना छोड़ना।"
सोचता मानव कितना कष्ट है, इस नन्हीं सी जान को,
पर भूल जाता है देखना, उसकी ऊंची उड़ान को।
चिड़िया बोली- हे मानव तुम महलों में रहते हो,
सोने-चांदी की बेड़ियों को, तुम अपनी किस्मत कहते हो।
मेरा घर तो पूरा अंबर है, कोई सीमा, कोई दीवार नहीं,
तुम्हारे पास सुख के साधन हैं, पर मन में सच्चा प्यार नहीं।
“मैं तिनका चुनकर थकती हूँ, पर चैन की नींद सो जाती हूँ,
तुम गद्दों पर भी जागते हो, मैं भोर में गीत सुनाती हूँ।
चिंता नहीं मुझे कल की कोई, ना संचय की कोई बीमारी है,
मेरा जीवन कष्ट भरा नहीं, मेरी आजादी सबसे प्यारी है।"
-: सार्थक पियुष सिंह
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