काश पर्वत थोड़े कम कठोर होते तो समझ पाते कि,
कठोर होना ऊँचे होने का पर्याय नहीं,
काश नदियां थोड़ी कम भावुक होतीं,
तो समझतीं कि आगे बढ़ते रहना ही सबसे जरूरी होता है,
काश समुद्र थोड़े कम विस्तारित होते तो समझते,
कि गहरा होना विशाल होने का पर्याय नहीं,
काश मैं भी समझ पाता कि उसका होना,
मेरे होने का पर्याय नहीं!
— सारिका 'मैत्रेयी'
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