भरत की भूमि में गूँजा ब्रह्म-नाद का गान जहाँ,
मर्यादा में राम रमे, और कृष्ण बने विज्ञान जहाँ।
नालंदा के महा-दीप से चमका विश्व-जहान यहाँ,
शस्त्र त्याग कर अशोक-बुद्ध ने फहराया था ध्यान यहाँ।
वो मैं ही हूँ, वही पुरातन, अमिट मेरा स्वाभिमान है,
सदियों का जो साक्ष्य बना, वो मेरा हिंदुस्तान है।
मुकुट बना हिमराज खड़ा, सागर चरणों का दास जहाँ,
गंगा-यमुना की लहरों में वेदों का विश्वास जहाँ।
थार की तपती रेतों से, सुंदरवन की हरियाली तक,
केसर की घाटी से लेकर, कन्याकुमारी की लाली तक।
अनेकता में एकता का, जो रचता इक वरदान है,
कोस कोस पर बदल रहा, वो अखंड हिंदुस्तान है।
मंगल की हुंकार गूँजती, इस माटी के कण-कण में,
झाँसी की तलवार आज भी चमक रही है रण-कण में।
भगत-बिस्मिल-बोस की, वह शोले जैसी आग लिए,
सरदार के पावन लोहू का, इंकलाबी राग लिए।
माना आज अँधेरा भारी, राहों में अंगारे हैं,
पुलवामा-सिंदूर हुआ, पर हम कब हिम्मत हारे हैं!
इसी गौरवशाली इतिहास की, लौ हर दिल में जलती है,
फिर से विश्वगुरु बनने को, आज नवभूमि मचलती है।
पतझड़ का वह दौर गया, जब टूटी थीं सब शाख़ें भी,
पिंजरे में क़ैद थीं फितरत भी, और रोती थीं सब जानें भी।
चहकी है भूमि फिर से, पंछी ने पर फैलाया है,
शाखों पर स्वर्णिम चिड़िया ने, फिर एक बसेरा पाया है।
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