बेबाक सफर में चल तो रहे हैं,
मन्ज़िल मिलेगी ये कह नहीं सकते।
भविष्य के लिए योजनाएं निर्मित तो कर रहे हैं,
वो क्रियान्वित होगी ये कह नहीं सकते।
जीवन का लक्ष्य साध तो लिया है,
अर्जुन की भांति बेध पाएंगे ये कह नहीं सकते।
सांसे चल तो रही हैं,
कब तक चलेगी ये कह नहीं सकते।
अंत में अगर है सब अनिश्चित तो निश्चित क्या??
उत्तर- ये कह नहीं सकते।
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X