ना महलों की चाहत,
ना शहरों की रोशनी,
मुझे तो भाती है
ये मिट्टी और हरियाली।
जहाँ नन्हे फूल भी
मुस्कुराना सिखाते हैं,
वहीं तो मेरे पहाड़
दिल के करीब आते हैं।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X