“शहर की भीड़ में बेटा सबको मिल जाता है…
बस एक माँ का बेटा, उसे ही नहीं मिलता।”
हर शाम दरवाज़े पर बैठ जाती है माँ,
राहों में अपने बेटे को ढूँढ़ती है माँ।
चूल्हे की आँच अब भी जलती तो है,
पर बेटे के बिना रसोई सूनी लगती है।
फ़ोन की घंटी बजती है तो दिल धड़कता है,
“मेरा बेटा होगा…” कहकर चेहरा चमकता है।
फिर जब कोई और आवाज़ सुनाई देती है,
माँ चुपचाप अपनी आँखें पोंछ लेती है।
बेटा शहर में अपने सपने बुनता रहा,
और गाँव में एक घर उसे याद करता रहा।
लौट आना कभी माँ के पास…
क्योंकि दुनिया तुम्हें फिर मिल जाएगी,
पर माँ की राह देखती ये आँखें…
हर बार तुम्हारा इंतज़ार नहीं कर पाएँगी।
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