आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

शायद यही मेरा गुनाह था

                
                                                         
                            शायद यही मेरा गुनाह था,
                                                                 
                            
कि मैं एक पुरुष था,
इसलिए उन्होंने मुझे बेरहमी से मारा,
गोली की हर आवाज़ में नफरत थी,
और हर वार में इंसानियत की हार थी।

शायद यही मेरा गुनाह था,
कि मैं एक पत्नी थी,
जिसने अपने सुहाग को
अपने आँचल में टूटते हुए देखा।
उसकी साँसे थम रही थीं,
पर मेरी चीखें आसमान तक भी न पहुँच सकीं।

शायद यही मेरा गुनाह था,
कि मैं एक बच्चा था,
जो अपने पिता को न बचा सका,
क्योंकि मासूम आँखों ने
अब तक नफरत का चेहरा न देखा था।

या फिर मेरा गुनाह बस यही था —
कि मेरा नाम,
मेरी पहचान,
मेरे धर्म से जुड़ी थी।

हाँ, शायद यही था असली अपराध
जो उन कायर आतंकियों को
मेरे अस्तित्व से चिढ़ थी।

मैं तो बस ज़िंदगी के कुछ हसीन पल
जीने गया था पहलगाम,
पर लौटते हुए मेरा नाम,
मेरा धर्म, मेरा अतीत —
सब मिटा दिया गया।

कब तक हर बार मारे जाएँगे हम,
कब तक जश्न मनाएँगे वो,
जब हम मातम में होंगे डूबे?
पर समय की एक सच्चाई जानते हो जनाब?

वो बदलता है...
और इस बार बदला भी।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
11 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर