आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मैं आदि हूँ, मैं अनंत हूँ, मैं ही जीवन का वसंत हूँ

                
                                                         
                            हर श्वास मुझसे कह रही है,
                                                                 
                            
तुझे जीना भी मेरे संग है,
और मरना भी मेरे संग है।

मैं तेरी खुशी भी हूँ,
मैं तेरा दर्द भी हूँ,
मैं तेरा क्रोध भी हूँ,
मैं तेरी शांति भी हूँ।

मुझे हर पल महसूस करके तो देख,
मैं तेरे संग हर पल रहती हूँ,
तेरे मौन में, तेरी धड़कन में,
मैं तुझसे ही कुछ कहती हूँ।

मुझसे तेरी कोई बात छिपी नहीं,
मैं तेरे हर कर्म की साक्षी हूँ,
तेरे हर भाव, तेरे हर विचार में,
मैं ही तेरी मौन अभिव्यक्ति हूँ।

मैं दिन भी हूँ, मैं रात भी हूँ,
मैं जीवन की हर सौगात भी हूँ,
मैं फूलों की महकती खुशबू हूँ,
मैं प्रकृति की हर बात भी हूँ।

मुझमें ही पूरा ब्रह्मांड समाया है,
मुझसे ही जीवन का अर्थ आया है,
जिसने मुझे भीतर जाकर पहचाना,
उसने अपने अस्तित्व का रहस्य पाया है।

मैं आदि हूँ, मैं अनंत हूँ, मैं ही जीवन का वसंत हूँ,
मैं ही आरंभ, मैं ही अंत हूँ, मैं जीवन हूँ, मैं मृत्यु हूँ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर