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की ख्याल भी नहीं आता उसे अक्सर

                
                                                         
                            मैं कहां से लाऊ हाथ उसका
                                                                 
                            
लकीरें देखूं भी तो कैसे
एक शख्स जो बात तो करता है
पर दूर बहुत है,
इतनी दूर
की ख्याल भी नहीं आता उसे अक्सर
की एक कदम जो उसने बढ़ाया
चार कदम जो हम साथ चले भी थे,
कदम जो मुसलसल
एक फलसफे के इंतज़ार में,
तकते हैं राह,
कह दो उनसे कोई,
लकीरों में किस्मत ढूंढ रहा हूं मैं
-संजीव
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2 घंटे पहले

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